मंदिर में फूल चढ़ा कर आए तो यह एहसास हुआ कि… पत्थरों को मनाने में, फूलों का क़त्ल कर आए हम गए थे गुनाहों की माफ़ी माँगने …. वहाँ एक और गुनाह कर आए हम ….

ये ज़िन्दगी का रंगमंच है दोस्तों…. यहाँ हर एक को नाटक करना पड़ता है. “माचिस की ज़रूरत यहाँ नहीं पड़ती.. यहाँ आदमी आदमी से जलता है…!!”

               मिली थी जिन्दगी किसी के ‘काम’ आने के लिए.. पर वक्त बित रहा है कागज के टुकड़े कमाने के लिए.. क्या करोगे इतना पैसा कमा कर..? ना कफन मे ‘जेब’ है ना कब्र मे ‘अलमारी..’ और ये मौत के फ़रिश्ते तो ‘रिश्वत’ भी नही लेते…

अच्छा दोस्त जिंदगी को जन्नत बनाता है; इसलिए मेरी कद्र किया करो; वर्ना फिर कहते फिरोगे बहती हवा सा था वो; यार हमारा था वो; कहाँ गया उसे ढूढों!..

दुनिया में कोई भी चीज़ अपने आपके लिए नहीं बनी है। जैसे: दरिया – खुद अपना पानी नहीं पीता। पेड़ – खुद अपना फल नहीं खाते। सूरज – अपने लिए हररात नहीं देता। फूल – अपनी खुशबु अपने लिए नहीं बिखेरते। मालूम है क्यों? क्योंकि दूसरों के लिए ही जीना ही असली जिंदगी है।

मनुष्य सुबह से शाम तक काम करके उतना नहीं थकता; जितना क्रोध और चिंता से एक क्षण में थक जाता है।

जरुरत के मुताबिक जिंदगी जिओ – ख्वाहिशों के मुताबिक नहीं। क्योंकि जरुरत तो फकीरों की भी पूरी हो जाती है; और ख्वाहिशें बादशाहों की भी अधूरी रह जाती है।

जीवन का सबसे बड़ा अपराध – किसी की आँख में आंसू आपकी वजह से होना। और जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि – किसी की आँख में आंसू आपके लिए होना।

जिंदगी में दो चीज़ें हमेशा टूटने के लिए ही होती हैं: “सांस और साथ” सांस टूटने से तो इंसान 1 ही बार मरता है; पर किसी का साथ टूटने से इंसान पल-पल मरता है।

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